मिलन तो मजबूरी है
उत्सव हैं तो पुराने चेहरे
ढूढने जरूरी हैं
मुलाकातों का दौर जारी है
कुछ शूरूर तो है
पर ग़म कुछ गुरूर भी है
मिलन तो मजबूरी है
वर्ना काहे का मिलना जरूरी है
रोज रोज नही मिल सकते हैं
पर प्रेम लिए बैठे हैं
हम कहीं और
वो कहीं और हुए जीते हैं
वो अब हमें दिलों की बात बताते नहीं
क्योंकि अब हम उन्हें सताते नहीं है
उन्हें अब हम मेहमान नजर आते हैं


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